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Friday, December 5, 2014

वो ख़ास है

"वो" बेक़रार दिन है 
"वो" मुस्कुराती शाम है 
"वो" नशीली रात है 
"वो" लिपटी सहर है 
"वो" खिलती सुबह है … 

जिन्दगी के हर पल में 
दिल के हर धड़कन में 
जिस प्यार का एहसास है … 

वो ख़ास है  
वो ख़ास है  
वो ख़ास है … 

Tuesday, November 5, 2013

खुदगर्ज

साजिसें हो जाती हैं अब हादसों के शक्ल में, 
कुछ भरोसेमंद भी गद्दारियाँ कर जाते हैं। 
अमीर बनने की हवस इन्सान में बढती है जब, 
राह-ए-दौलत में नीलाम बेटियां कर जाते हैं। 

नकाब पहने दुश्मनों से दोस्ती अच्छी नहीं, 
वक्त पाते ही वो सबकुछ लूट के ले जाते हैं। 
खुदगर्ज लोग प्यार के बदले में अपने यार को, 
ता-जिंदगी  वे-आबरू का दर्द दे के जाते हैं। 

खून से भी सींच दें कुछ लोगों के रिश्ते  मगर, 
वो जरुरत पर सियासी पैतरे अपनाते है। 
बेशर्म लोगों  को अब आईने  से  फिक्र क्या, 
वो दलीलों से दिलो दिमाग  को भरमाते हैं। 

मजनू बनने की तमन्ना प्यार में बेकार अब, 
मुफलिसी में आशिक भी बेवफा कहलाते हैं। 
प्यार में उनके "विजय" कुर्बान हो गया मगर, 
वो हमारी मौत को भी बेवजह कह जाते हैं।

Wednesday, January 4, 2012

भ्रम


खुली आँखों का स्वप्न 
बन जाता है
कुछ देर का
भ्रम /
  एक ऐसा भ्रम
जो देता है मुझे
गगन की ना ख़त्म होने वाली
असीम ऊँचाई /
जहाँ जाकर मैं
खो जाता हूँ 
अनंत ब्रह्माण्ड में /

पर
मिलता नहीं मुझे 
कोई स्वर्ग और ना ही कोई अप्सरा /

 मायूस हो
गिर जाता हूँ धरती पर 
पाता हूँ असहाय 
खुद को /
और तब 
ख़त्म हो जाता है भ्रम
टूट जाता है स्वप्न
बोझिल हो
बंद हो जाती हैं आँखें /

Friday, January 14, 2011

खुदकशी


खुशियाँ भरी हैं मेरी जिन्दगी में,
गम को गले से लगाने लगा हूँ/
गैरों ने भी दोस्ती कर ली हमसे,
दुश्मनी खुद से निभाने लगा हूँ//

फूलों को हटा कर जिन्दगी से अपने
राहों में कांटे सजाने लगा हूँ/
चांदनी से रौशन है हर शाम मेरी,
अंधेरों की खातिर तड़पने लगा हूँ //
चारों तरफ हैं मोहब्बत की नजरें,
निगाहों को काफ़िर समझने लगा हूँ/
डूबा रहा दिल चाहत के रंग में,
अब रंगों से परहेज करने लगा हूँ//
तूफानी लहरें डुबो न सकी,
अपनी कश्ती को मैं खुद डुबाने लगा हूँ/
किस्मत में मेरी लम्बी उम्र है,
खुद कब्र अपनी बनाने लगा हूँ//


Friday, December 10, 2010

दिल डरता है




                    पाल सकता नहीं एक और नासूर,
                    चोट खाने से ये दिल डरता है/

                    लुटा है अदाओं ने उम्र भर मुझको,

                    मौत मिल गयी है, दिल जिन्दगी से डरता है /



                    नजर मिलाना ना मुझसे कसम है तुझे,
                    नजर मिलाने से नजर दिल को लगता है/

                    सोया नहीं ता-उम्र आशिकी में,

                    नीन्द आ गयी है, दिल जागने से डरता है/

                    नाजुक हो नाजो अदा है तुममे,
                    पा भी लूँ दिल छूने से डरता है/
                    लुट चूका है 'विजय' गुजरे ज़माने में,
                    अक्ल मिल गयी है, दिल फिदायी से डरता है/


Monday, December 6, 2010

फटे आँचल की जिन्दगी

                 बुरी नजरों से खुद को फटे आँचल में छिपाती, 
               मजबूर जिन्दगी  नहीं जानती, 
           किस रईस के बहकने का कारण बनेगी/

            इज्जत को छुपा कर बाजार से गुजरती, 
               लाचार जिंदगी  नहीं जानती,
           किस चौराहे पर लुट का कारण बनेगी/


           पत्थरों को फोड़ कर मेहनत की रोटी कमाती,
                बेवस जिन्दगी  नहीं जानती ,
             कब किसके भूख का कारण बनेगी/

                 अपनों से मिले लांछनों को चुपचाप सहती,
              असहाय जिन्दगी  नहीं जानती,
            कितने ही विवादों का कारण बनेगी/

        अपने अधिकारों के लिए कानून से फरियाद करती,
            पनाह गुजीन जिन्दगी  नहीं जानती,
        न्याय के आड़ में कौन से उत्पीड़न का कारण बनेगी/

         समाज के हैवानियत से तंग आकर खुद को कोसती,
                लुटी जिन्दगी  नहीं जानती,
           खुद ही अपने खुद खुशी का कारण बनेगी/